12 March 2011

जापान में बढ़ा भूकाँप हो गया।

हम ठीक हैँ। लेकिन अब तक हिल रह है। और 1-2 दिन ध्यान रखने की ज़रूरत है।

अगर किसी की परिचित उत्तर पूर्व जापान में रहते हैं तो अब मत फोन कीजिए। फोन लाइन बिज़ी है और अब तक ज़मीन हिल रहने से काफी सुरक्षित नहीँ है। 

24 August 2010

रक्षा बंधन

रक्षा बंधन बधाई हो!
सुना है कि रक्षा बंधन भाइयों-बहनों क त्योहार  है। बहन अपने भाइयों को राखी देती हैं और भाई बहनों की रक्षा करने को प्रतिज्ञा करते हैं। यह जाने के बाद, मैं हर साल भारतीय मित्रों को राखी भेजती हूँ। ज़रूर, जापान में राखी नहीं है, इसलिए अपने हाथ से किसी तरह राखी-वाई बनाती हूँ। इस साल की राखी ऐसी हैं।

पता नहीं उन लोगों को ऐसी अजीब राखी वाई पसंद आएँ या नहीं। एक बार जापानी वासी भारतीय आदमी को भी दी थी, लेकिन लगता है कि उन को इतना पसंद नहीं आई। फ़िर भी भारत में बहुत ज़्यादा भाईयोंने मेरे सेवा कर देते थे। मैं वह कबी नहीं भूलूँगी, यह बताने की जगह हर साल भीजती हूँ।

मेरे दो बड़े भाइ हैं। लेकिन जापान में रक्षा बंधन नहीं है, इसलिए अब तक उन्हों को राखी नहीं भेजी हूँ। लेकिन इस साल एक भाई को पहली बार राखी भीजी। वे अब बीमार हैं। जल्दी ठीक होकर सदा के लिए मेरी रक्षा कर दें ... ऐसा बताना चाहती थी।

आज रक्षा बंधन की बात वेब पर लिखकर, दूसरे लोग से एक टिपण्णी मिली। इस में ऐसा लिखा था ... दक्षण जापान, ओकिनावा में, 'ओनारि -गामि' का नाम विशवास है। ओकिनावा बोली में 'ओनारि' मतलब 'बहन' । वहाँ ऐसा कहा जाता है कि बहनों के पास शक्ती है कि भाई की रक्षा करने की। भाई मछ्ली पकड़ने समद्र जाता है, तब बहन भाई को कुछ देती है, और यह कवच हो जाता है। भाई की  शादी होने के बवजूद, जब भाई की तबीयत ख़राब हो जाएँ तो,  ठीक होने के लिए प्रर्थना करने के लिए पत्नी नहीं, बहन बुला जाती है।

यह जाने के पहले मैंने राखी भीजी। अब आशा करती हूँ मेरी राखी भाई के कवच हो जाएगा।  

15 August 2010

15 अगस्त

भारत का स्वतंत्रता  दिवस बधाई हो ! मैं सन् 2006 में भारतीय दोस्त के साथ स्वतंत्र दिवस मनाने  तोक्यो के भारतीय दूतावास गई हूँ।

इधर जापान में भी 15 अगस्त तो विशेष दिवस है। सन् 1945 के इसी दिन, हार से हापान के लिए द्वितीय विश्व युद्ध खतम हो गया। 15 अगस्त हमरे लिए युद्ध के डर, दुख याद करके, फिर कभी नहीं लड़ने का निश्चय करने का दिन है।

विश्व युद्ध के काफ़ी बाद मेरा जनम हुआ था। फ़िर भी ऐसा कहा सकती हूँ ... हम अंतिम पीढ़ी हैं जिसे युद्ध के अहसास होता है। मेरे पिता जी लड़ाई गए। मेरी सहेली के पिताजी को हिरोशिमा में बमबरी  हो गया।  और मेरे बचपन में कभी कभी आहत सैनिक देखा। जैसा कोइ मेला, ज़्यादा लोग शहर में  आने के दिन, आहत सैनिक ... युद्ध में बाह या पाँव खोए लोग, ज़मीन पर बैठे हुए थे। शायद युद्ध खतम होने के बाद  तब करीब 25 साल हो गए हो। फिर भी लोगों के लिए युद्ध के याद तब तक साफ़ था और ऐसा लोग भी कम नहीं होगा कि अपने परिवार युद्ध में खो गय। इसलिए अधिकतर लोग  आहर सिपाहियों को पैसा देते थे।  अपनी मंमी से भी बार बार यद्ध की बात सुना। मंमी की सहेलियाँ हर महीने एक पुस्तिका  प्रकासित  क रते हैं। अब PC से सब कुछ  आसानी से बना सकने के बावजूद, वे लोग साहस के साथ, हस्त्लिखित पुस्तिका बनाते हैं। हमेशा उस पुसतिका 4 पन्ने  की है, लेकिन हर साल के अगस्त के अंक, खासकर 24 पन्ने हिस्सा लेते हैं। युद्ध की बात लिखने के लिए। ऐसा अगली पीढ़ी को युद्ध की बात सुनाने की कोशिश करते हैं। युद्ध दुख है, कोई अच्छाई नहीं है ... यह समाझाने की कोशिश  तनमन से करते हैं।
 

और 15 अगस्ते के आसपास जापान में ओबोन का नाम जापानी बौध  तयोहार है। कहा जाता है कि ओबोन में स्वर्गवासी पूर्वाज हमें मिलने के लिए इस दुनिया वापस आते हैं। हम सपरिवार पूर्वाज स्वागत करने के लिए अपने देश वापस जाते हैं और इसके लिए अधिकतर जापानी कंपनियों में 15 अगस्त के आसपास छुटठियाँ देते हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध खतम होकर 65  साल बीत गए। इस युद्ध जाननेवाले भी कम हो रहे हैं। लेकिन हम जापानी, कभी भूल नहीं सकते। सदा के लिए याद रखना चाहिए। युद्ध दुख है। अपने प्यारे लोग भी मर जाता है। कोई अच्छाई नहीं है। कभी  नहीं लड़ाई करना।

13 August 2010

जापानियों के नाम 1

जापानी का नाम, अपना नाम और कुलनाम से बना है। बीच का नाम, जैसे अपने पिताजी का नाम, जगह का नाम, ऐसा नाम नहीं लगाते हैं। और पहले कुलनाम, और इस के बाद अपना नाम आते हैं। ...उदाहरण के लिए, राज कपूर, जापानी शैली में लिखूँ तो कपूर राज हो जाता है। जापान ही नहीं, चीन और कोरिया के नाम भी ऐसा है। चीनी अभिनेता, जैकी चैन का सही ( जन्म) नाम तो 陳 港生 चैन कॉंग सैग है।  चैन उस के कुलनाम और कॉगसैग अपना नाम है। 

150 साल पहले तक अधिकतर जापानी जनता के पास कुलनाम नहीं था। सिर्फ़ कुलीन, क्षत्रिय, बड़े सेठ, ऐसा बड़े लोगों ही कुलनाम इस्तेमाल करते थे। और कुलीन, क्षत्रिय, कुलनाम के अलावा, ओहादा, जगह का नाम, आदि तरह तरह की जानकारी नाम में लगाते थे। सन् 1857 में आधुनिक राज्य के व्यवस्था से सब लोगों को कुलनाम लगाना अनिवार्य हो गया। तब तक जिस के पास क्कुलनम नहीं था, वे लोग अपनी मर्जी से नाम लगा सकते थे। प्रसिद्ध वीर के कुलनाम, जगह का नाम, जैसा जंगल में रहने वाले का कुलनाम 'जंगल', नया अजीब नाम, सब कुछ मना था। पहले का कुलनाम छोड़कर खुद नया नाम लगाए लोग भी कम नहीं था।

अब सब के सब के पास एक अपना नाम और एक कुलनाम है। शादी के बाद, पति या पत्नी, दोनों के एक कुलनाम ही चूनना चाहिए। अब शादी के बाद भी अपना कुलनाम छोड़े बिना, अलग अलग कुलनाम लगाने का विचार भी बढ रहा है।

खैर, जापान में, ऐसा परिवार भी होता है जिन लोगों के पास कुलनाम नहीं है। वह सम्राट के परिवार हैं। अब के सम्राट का नाम अकिहितो है। फिर भी हम कभी नहीं उन्हों को उन के नाम से लेते हैं। ज़रूर, सिर्फ सम्राट कहते हैं। तो कहने में कैसे अब का सम्राट और दूसरे सम्राठ से अलग अलग करें? अब का सम्राट तो खासकर 'किंजो तेन्नो' (अब का सम्राट) कहते हैं। और सब सम्राट, स्वर्गवास होने के बाद दूसरा सम्राट नाम दिए जाता है। अब का सम्राट के पिता जी का नाम हिरोहितो था, और उन का दिए गया सम्राट नाम तो शोओवा सम्राट है। इसलिए हम उन लोगों को चर्चा करने के लिए, 'शोओवा सम्राट और (किंजो) सम्राट', ऐसा कहते हैं। राजकमारी  (सम्राट की बेटी) , शादी के बाद पहली बार अपना कुलनाम प्राप्त करती हैं। और सम्राजी  को, सम्राट से शादी होने के लिए कुलनाम छोड़ना पड़ता है। 

05 August 2010

पृथ्वी कला मेला

जहाँ में 3 से 18 वर्ष की आयु तक मैं रहती थी और अब तक मेरा मैका है, तोओकामाचि जापान के एक छोटा शहर है। उस की जनसंख्या सिर्फ 60,000 से कम, उस का मुख्य उद्योग किमोनो था,  फिर भी चूंकि अब जापानी किमोनो बहुत कम पहनते हैं, इसलिए किमोनो उद्योग भी ढल हो गया। बाकी स्वादिष्ट चावल और बरफ़ से प्रसिद्ध शहर है।

वहाँ तोओकामाचि में सन् 2000 से हर 3 साल में 'पृथ्वी (ज़मीन) कला मेला' का नाम Art Triennial आयोजित किया जाता है। 2000, 2003, 2006, 2009, अब तक चार बार। हर पृथ्वी कला मेला के लिए देश विदेशों से 150-250 कलाकार आकर कलकृतियाँ बनाते हैं। जब मैं 2006 में गई, भारतीय कलालार, Mandan Lal की कलाकृति भी देखा।

इस साल 2010, मेला का साल नही6 है। लेकिन तीन सालों के बीच में भी हर साल कुछ न कुछ कार्यक्रम चलाते हैं। अब अगस्त के अंतिम दिन तक करीब एक महीने के लिए तरह तहर के कार्यक्रम चले रहे हैं। इधर उधर के कलाकृतियाँ देखने घूमने की बस ब ही चलती है। ....हाँ,  पृथ्वी कला मेला, म्यूजियम में देखते नहीं। तोओकामचि और इस के बगलवाले नगर, त्सुनंमाचि के 760km2 के इलाके में, इधर उधर कलाकृतियाँ बने हैं। खेत में, खाली ज़मीन पर, खाले मकान में...।
किमोनो उद्योग ढलने के बाद, अपने पुश्तैनी ज़मीन, मकान छोड़कर वहाँ से बड़े शहर गए, ऐसा लोग कम नहीं था। ऐसा खाले मकान, स्कूल में भी कलाकृति बनाना और सजाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।यह भी एक खाला मकान था।

यह एक किसान का पुराना मकान था। अब कोई भी नहीं रहते हैं। एक विश्वविद्यालाय के टीम ने इस मकान को पूरा उत्कीर्ण कर डाला...छत, फर्श, दीवार, सारा मकान को।

यह रूसी के Ilya & Emilia Kavakov का कलाकृति है।




इस खेत के मलिक बूढ़े होकर सीढ़ीदार खेत में चावल बनाने में कठिनाई महसूस करने लगे। अगले साल, चावल बनाना छोड़ दूँगा...ऐसा सोचते थे। लेकिन Ilya & Emilia Kavakov ने खेत में कलाकृति बनाए। वे कालकृति, गुड़िया, खेत में कम करने के लिए बाधा हैं। पर...मलिक को वे पसंद आया...और अब प्यारा लगता है।  शायद इस साल भी, उन  मलिक, गुड़ियों के साथ खेत में काम करते होंगे।

मुझे सब से यह अच्छा लगा।

यह सड़क चलेंगे तो अवाज़ सुनाई दे रहा है। तोओकामाचि के बड़े लोग त तोओकामाचि बोली में ऐसा  कहते हैं  "आइए, अंदर अना।"रंग रंग के लकडी प्लेट में, हर बूडे लोगों के उपनाम लिखे हैं जो तोओकामाचि के एक छोटे इलाके में रहते हैं। मेरे पिता माता तोओकामचि वाले नहीं होने के बावजूद, उस बोली सुनकर कंठ भर आया।


पृथ्वी कला मेला के कलाकृतियाँ, इस साइट में देख सकते हैं। इमारत में नहीं, खुला जगह, सुन्दर देहात के नज़्ज़ारा के साथ, ताज़ा हवा लेते लेते देखने की कलाकृति भी बहुत खूब।

29 July 2010

नूडल खाने का शिष्टाचार

जापान में आजकल खूब गर्मी पड़ती है। गर्मी मौसम में जैसा भारतीय खाना, थाइलैंड के खाना, ऐसा मसालेवाले यानि तीखा खाना अच्छा लगता है। लेकिन ज़्यादा गर्मी से खाने का इच्छा भी खो गया तो हम जापानी ठंडा खाना खाते हैं। जी, हम भी काफ़ी जानते हैं कि ठंडा खाना पेट के लिए इतना अच्छा नहीं है। फिर भी कम से कम कुछ खाने का इच्छा उठाने की ज़रूरत है। भारी गर्मी में ठंडा नूडल मज़ेदार लगता है।
सोओमें

जापान में नूडल के प्रकार बहुत ज़्यादा हैं। चौमेन की तरह नूडल भी हैं, लेकिन अधिकतर सूप के साथ खाते नूडल हैं। गैहूँ  का नूडल, कूदू के नूडल, मोटा नूडल, पतला नूडल...तरह तरह के नूडल और तरह तरह के सूपके जुटाव अनेक है।
सोबा
उदों 

गर्मी मौसम में नूडल ठंडा सूप के साथ खाना अच्छा लगता है। सूप के साथ नूडल जल्दी खाना मज़ेदार है ताकि नूडल न पानी लेकर मोटा हो जाए। नूडल जल्दी खने में विशेष शिष्टाचार होता है कि कसकर आवाज़ करने का।

यह अजीब बात है। आमतौर पर जापानी शिष्टाचार में, खाने -पीने में आवाज़ करना करताया जाता है। हम आवाज़ न करने के लिए मुँह बंधकर चबाते हैं। सूप पीते समय भी धीमा लेते हैं।  फिर भी नूडल लेने में ही आवाज़ न करके चबाएँ तो 'गाँवारी' कहा हाता है। नूडल चबाना देखने में बदमज़ा और भद्या लगता है। आवाज़ करेगे तो ठीक है...ऐसा आसनी बात नहीं है। देखने में ललित, और सुनने में स्वादिष्ट आवाज़ से खाना चाहिए।

25 July 2010

भूमि पूजन

एक सवेरे हमरे घर से रास्ते के पार के ज़मीन पर भूमि पूजन करते देखा।

जापान में मकान या इमारत बनवाने से पहले, उस स्थल पर अनुष्ठान किया जाता है कि ज़मीन के भगवान को उस  निर्माण कार्य की सुरक्षा और खैर मनाने के लिए। पूजन में  कम से कम 3 लोग हिस्सा लेना चाहिए। मकानवाला, ठीकेदार और पूजा करते याजक ( पुजारी) ।

हमारे घर फ़्लैट के आठ वीं  मंजिल में है। वहाँ से खींचने से फ़ोटो इतना साफ़ नहीं ।

बायाँ छातावाली महीला, शायद मकानवाला ( यजमान ) है। दायाँ खड़ा होते आदमी, वह ठीकेदार होगा। और बीच का किमोनोवोला, वह पूजारी है।

भूमि पूजन करने में 4 कोने में हरा बाँस खड़ा करके धान के पयाल से बने पवित्र रस्से बाँस के चार कोने को बाँधकर चौकार घेरा बनाते हैं। बाँस और धान के पयाल से बने घेरा पवित्र स्थान ( ज्ञमंडल ) मनाकर, अनुष्ठान स्थल हो जाता है। वहाँ पर एक मेज़ रखते हैं और उस पर शराब, पानी चावल, नमक, सब्जी, वैसा भोज लगाकर भूमि पूजन करते हैँ।

जापानी मकान लकड़ी और कागज़ से बना है। आगे लकड़ी बिठाने में भी और एक रस्म होगी। पूजन, रस्म, सब ताइआन...मंगल दिन में किया जाता है।