Showing posts with label जापान में रहना. Show all posts
Showing posts with label जापान में रहना. Show all posts

12 March 2011

जापान में बढ़ा भूकाँप हो गया।

हम ठीक हैँ। लेकिन अब तक हिल रह है। और 1-2 दिन ध्यान रखने की ज़रूरत है।

अगर किसी की परिचित उत्तर पूर्व जापान में रहते हैं तो अब मत फोन कीजिए। फोन लाइन बिज़ी है और अब तक ज़मीन हिल रहने से काफी सुरक्षित नहीँ है। 

13 August 2010

जापानियों के नाम 1

जापानी का नाम, अपना नाम और कुलनाम से बना है। बीच का नाम, जैसे अपने पिताजी का नाम, जगह का नाम, ऐसा नाम नहीं लगाते हैं। और पहले कुलनाम, और इस के बाद अपना नाम आते हैं। ...उदाहरण के लिए, राज कपूर, जापानी शैली में लिखूँ तो कपूर राज हो जाता है। जापान ही नहीं, चीन और कोरिया के नाम भी ऐसा है। चीनी अभिनेता, जैकी चैन का सही ( जन्म) नाम तो 陳 港生 चैन कॉंग सैग है।  चैन उस के कुलनाम और कॉगसैग अपना नाम है। 

150 साल पहले तक अधिकतर जापानी जनता के पास कुलनाम नहीं था। सिर्फ़ कुलीन, क्षत्रिय, बड़े सेठ, ऐसा बड़े लोगों ही कुलनाम इस्तेमाल करते थे। और कुलीन, क्षत्रिय, कुलनाम के अलावा, ओहादा, जगह का नाम, आदि तरह तरह की जानकारी नाम में लगाते थे। सन् 1857 में आधुनिक राज्य के व्यवस्था से सब लोगों को कुलनाम लगाना अनिवार्य हो गया। तब तक जिस के पास क्कुलनम नहीं था, वे लोग अपनी मर्जी से नाम लगा सकते थे। प्रसिद्ध वीर के कुलनाम, जगह का नाम, जैसा जंगल में रहने वाले का कुलनाम 'जंगल', नया अजीब नाम, सब कुछ मना था। पहले का कुलनाम छोड़कर खुद नया नाम लगाए लोग भी कम नहीं था।

अब सब के सब के पास एक अपना नाम और एक कुलनाम है। शादी के बाद, पति या पत्नी, दोनों के एक कुलनाम ही चूनना चाहिए। अब शादी के बाद भी अपना कुलनाम छोड़े बिना, अलग अलग कुलनाम लगाने का विचार भी बढ रहा है।

खैर, जापान में, ऐसा परिवार भी होता है जिन लोगों के पास कुलनाम नहीं है। वह सम्राट के परिवार हैं। अब के सम्राट का नाम अकिहितो है। फिर भी हम कभी नहीं उन्हों को उन के नाम से लेते हैं। ज़रूर, सिर्फ सम्राट कहते हैं। तो कहने में कैसे अब का सम्राट और दूसरे सम्राठ से अलग अलग करें? अब का सम्राट तो खासकर 'किंजो तेन्नो' (अब का सम्राट) कहते हैं। और सब सम्राट, स्वर्गवास होने के बाद दूसरा सम्राट नाम दिए जाता है। अब का सम्राट के पिता जी का नाम हिरोहितो था, और उन का दिए गया सम्राट नाम तो शोओवा सम्राट है। इसलिए हम उन लोगों को चर्चा करने के लिए, 'शोओवा सम्राट और (किंजो) सम्राट', ऐसा कहते हैं। राजकमारी  (सम्राट की बेटी) , शादी के बाद पहली बार अपना कुलनाम प्राप्त करती हैं। और सम्राजी  को, सम्राट से शादी होने के लिए कुलनाम छोड़ना पड़ता है। 

12 July 2010

शोओजि के संबंध

कल शोओजि के बारे में लिखा। आज इस के संबंध काई बातें पर।

*  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *

शोओजि काग़ज़ अनपेक्षित टिकाऊ होने के बावजूद,  काग़ज़ तो काग़ज़ है। ऊँगुली से चुभाएँगे रतो फट जाता है। लेकिन जालीदार पर सारा शोओजि काग़ज़ चिपकाना तो झंझट है। इसलिए जब शोओजि काग़ज़ के एक भाग फटता है, हम पैचवर्क की तरह छोटा काग़ज़ चिपकाते हैं। जालीदार के एक फ़्रेम के अनुसार, चौकोरे रूप के काग़ज़ भी चिपका सकते हैं, लेकिन अधिकतर लोग, फूल या पत्ते की रूप में काग़ज़ काट करके गोटा-पट्ठा की तरह चिपकाते हैं। पर इतना छोटा गोटा-पट्ठे के लिएम, मेरे बचपन में पकाए चावल को कुचलकर पेस्ट की जगह प्रयोग करते थे।

*  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *  *

शोओजि, लकड़ी के जालीदार पर काग़ज़ चिपकाते हुए दरवाज़ा है। लकड़ी के जालीदार के ऊपर, गर्द लग जाता है। हम शोओजि के गर्द, झाड़न से झाड़कर कपड़े से पोंछते साफ़ करते हैं।
 लेकिन एक एक साफ़ करना बड़ा जाटिल है। व्यस्तता से और असावधानी से शोओजि की सफ़ाई पर कभी कभी ध्यान न देते हैं। ढुष्ट सास जी, जैसे टीवी कार्यक्रम में शोओजि के जालीदार को ऊँगुली से पोंछकर, "साफ नहीं है।", ऐसा कहाकर बहू को सताती हैं।

"साफ नहीं है।"
मुझे कमरा साफ करना इतना पसंद नहीं है, फिर भी मेरी स्वर्गीया सास जी बहुत अच्छी थीं, ऐसा कभी नहीं किया।  

11 July 2010

काग़ज़ का दरवाज़ा

जापानी मकान लकड़ी और काग़ज़ से बना है। जापान के हवा-पानी में नमी ज़्यादा है, इसलिए नमी लेने-देने वाली लकड़ी और काग़ज़ मकान की सामाग्री की रूप में अच्छे हैं। हमारा फ़्लैट फेरो-कंक्रीट से बना है, लेकिन लकड़ी काग़ज़ से बने जापानी कमरे भी हैं। कंक्रीट नमी लेने-देने में असर नहीं है। लेकिन हमें परंपरित जापानी कमरा पसंद है। जापानी परंपरित कमरे में तातामिका नाम चटाई,  हुसुमा का नाम काग़ज़ का बना किवाड, और शोओजि (शोजि) ,  काग़ज़ चिपकाए हुए जलीदार के दरवाज़ा या खिड़की हैं।



 शोओजि  और फुसुमा 


हुसुमा, शोओजि दोनों फिसलनेवाले हैं। हुसुमा बंद करें तो पार की दिखाई दे नहीं सकता, लेकिन चूंकि शोओजि के जालीदार पर चिपकाई काग़ज़ इतनी पतली है, इसलिए पारदर्शक दिखाई दे सकती है। शोओजि कमरे का रेशनदान है।

मेरी मैके में 3 जापानी कमरे हैं। तातामि,  शोओजि या फुसुमा भी बहुत ज़्यादा हैं।
 जापानी कमरा 


पहले शोओजि का  काग़ज़ सब हमारे परिवार के हाथ से चिपकाते थे।
सब से पहले, शोओजि के पुराना काग़ज़ हटा कर, लकड़ी का जालीदार पानी से पूरा साफ़ करते हैं। और लकड़ी के जालीदार को काफ़ी सुकी होने के बाद, स्टार्च पेस्ट से शोओजि काग़ज़ जालीदार पर चिपकाते हैं। मेरे पिता जी  अच्छी तरह चिपकाते थे। पिता जी के देहांत के बाद, मम्मी बूढ़ी होने से अपने हाथ से शोओजि का काग़ज़ चिपकाना छोड़ दिया। हर काई साल, फुसुमा-शोओजि बढ़ई को चिपकावाती हैं। इस साल मम्मी शोओजि का काग़ज़ बदरना  चाहती हैं...और बढ़ई को बुलाने के पहले,  घर साफ़ करने के लिए मुझे बुलाई। मैके में 20 से ज़्यादा शोओजियाँ हैं। सब को साफ करके नया काग़ज़ चिपकाने के लिए चौड़ी  जगह  चाहिए। लगता है कि फुसुमा का काग़ज़ भी 2-3 साल में बदरेंगे।

23 June 2010

पहचान

भरतीय लोगों से काई बार पूछी जाती हूँ कि जापानी महिलाओं, विवाहित-अविवाहित, कैसे पहचाएँ? भारत में मंगलसूत्र, सिंदूर, या वेडिंग रिंग हैं। सुना है, इसलिए आसनी से पता चलता है। लेकिन जापान में वेडिंग रिंग भी सब का सब विवाहित व्यक्ति पहनना तो ज़रूर नहीं है। शादी में वेडिंग रिंग अदला-बदला करना तो आजकल हमरा आदत हो गया, लेकिन पहले तो ऐसा नहीं था, और शादी के बाद रोज़ रिंग पहननेवाले ज़्यादा नहीं हैं। मेरे पति और मुझ दोनों को रिंग पसंद नहीं है, इसलिए पहले से वेडिंग रिंग नहीं खरीदीं।

बहुत पहले, जब हम जापानी रोज़ किमोनो पहनते थे, तब किमोनो की आस्तीन से पता चला। अविवाहित लड़कियों के किमोनो के पास लम्बी आस्तीन हैं, और विवाहित महिलाओं के किमोनो की आस्तीन छोटी हैं। और विस्तार से ठीक ठीक बताऊँ तो, अविवाहित महिला, छोटी आस्तीन वाली किमोनो भी पहन सकती हैं, पर विवाहित नहिलाएँ, लम्बी वाली  पहनना नहीं मनना जाता है। सिर्फ लम्बीवाली पहननेवाली ही अबविवाहित महिला हैं।


विवाहित महिला...छोटी आस्तीन किमोनो

अविवाहित लड़की ...लम्बी आस्तीन किमोनो 

आदमी के बारे में देखने में अविवाहित-विवाहित पहचाना उपाय, मैं नहीं जानती हूँ।

आम तौर पर जापान में देखने में दूसरों को पहचान करना तो मुश्किल है।बोलेंगे तो बोली के असर से अधिकतर पता चलेगा कि कहाँ में पला है। चेहरा या क़द-काठ में भी बहुत कम लगाने की समाग्री मिल सकते हो...उत्तरी जापान में गोरे लोग अपेक्षाकृत ज़्यादा रहते हैं।लेकिन कुलनाम से ज़्यादा पता नहीं चलता है....150 साल से पहले तक अधिकतम जनता के पास कुलनाम नहीं था। कुलनाम लगाने का व्यवस्था शुरू हुआ, सब अपनी मर्जी या कोई कारण से अपना कुलनाम लगाया।...इस के बारे में फिर लिखना चाहती हूँ।

19 May 2010

उँगलियाँ

जंकेन उँगलियों से मुद्र बनाने का खेल है। उँगलियाँ, खेल में ही नहीं, संख्या गिनने  में भी इस्तेमाल करते हैं।
भारतीय लोग एक हाथ से 16 तक गिन सकते हैं।  लेकिन हम गाँठ को न इस्तेमाल करने से सिर्फ़ 
10 तक ही गिनते हैं।

अँगूठा गोड़कर 1, अँगूठा और तर्जनी गोड़कर 2....और हाथ के सब उँगुलियाँ गोड़कर 5, फ़िर गुनी  उठाकर 6, छिगुनी और अनामिका उठाकर 7.....सब उठाकर हाथ खोएँ तो 10। हम ऐसा कर्ते हैं। यह अपने को समझाने का ढंग है।
संकदूसरे को संख्या बताने में...उदाहरण ले लिए, "दो चाय दीजिए।" ऐसा कहने में तर्जनी और मध्यमा उठाकर 2 उँगुलियाँ दिखाते हैं।

3
 



खैर, जापानी में हर उँगुली का नाम यह है।

        अँगूठा        ओयायुबि         माँ-बाप की उँगुली
        तर्जनी        हितोसशियुबि   इशारा करनेवाली उँगुली
        मध्यमा      नाकायुबि        मध्यम उँगुली
        अनामिका    कुसुरियुबि     दवा उँगली
        छिगुनी        कोयुबि          छोठी उँगुली

कहा जाता है कि प्रचीन काल में अनामिका से दवा लगाते थे या दवा पानी में गुलाते थे।
जब रास्ते में फ़्यूनेरल वैन (मुर्द ले जीनेवाली गाड़ी) की नज़र आएँ तो, ताकि वह गड़ी अपने माँ-बाप को  भी कभी नहीं साथ ले जाए, मुट्ठी भींचकर अपने अँगूठा छिपाते हैं।

17 May 2010

जंकेन

कोई न कोई निश्चित करने के लिए हम अमिदा-कुजि से जल्दी ढंग, जंकेन खेलते करते हैं।

"जं-कें-पों!" ऐसा पुराकर "पों" के आवाज़ के साथ, हाथ से बनाए हुए मुद्र एक दूसरे को दिखाते हैं, और उस मुद्र से जीत-हार निश्चित करते हैं।

गू...पत्थर

चोकि...क़ैची
   
                       






पा...कागज़

 
पत्थर चूंकि इतना कड़ा है कि क़ैची से काट नहीं पाता। इसलिए पत्थर क़ैंची को जीतता है।
क़ैंची कागज़ काट सकती है, इसलिए क़ैंची कागज़ को जीतती है।

लेकिन कागज़ से पत्थर लपेट सकता है, इसलिए कागज़ पत्थर को जीतता है।
पत्थर कैंची से,  क़ैंची कागज़ से, और कागज़ पत्थर से बढिया है।

अगर एक ही मुद्र बनाएँ तो बराबर हो जाता है। कोई जीतनेवाला नहीं है।
 फ़िर "जं-कें-पों" की वजह "आइको-दे-शो"(बराबर) कहाकर, जीत-हार मिलने तक मुद्र बनाकर खेलते हैं।

15 May 2010

अमिताभ लाटरी

कुछ में से एक चुनना या बारी बनाने में आप लोग कैसे करते हैं ? चुनाव या परिक्षा भी एक उपाय होगा। हम जापान में उठते बैठते अमिदा-कुजि या जंकेन खेलते खेलते एक लोग चुनते या बारी बदते हैं। आज अमिदा-कुजि के बारे में बताऊँगी।
सब से पहले खेल में भाग लेनेवले से बराबर रेखा ऊँचे से नीचे बनाएँ।
इस के बाद नीचे में चुनने का निशाना या बारी क नंबर लिखें।

और उसी निशाने को छिपाकर जैसी सीढी, बाएँ से दाएँ तक लाइन बनाएँ।

फ़िर ऊँचे से उन लाइन होकर नीचे तक जाना। बीच में लाइन हो तो वहाँ मुड़कर उतरें।

इस लाटरी में 4 वाले  को लाटरी लगायी।
हम यह लाटरी "अमिदा-कुजि" कहते हैं। अमिदा, जापानी में अमिताभ है। कहा जाता है चूंकि  लाटरी के अनेक रेखा, जैसे अमिताभ के प्रभा की तरह दिखाई देते हैं, इसलिए अमिताभ-लाटरी, अमिदा-कुजि का नाम बन गया।

11 May 2010

जापानी चप्पल

जापानी परंपरागत पोशाक किमोनो के साथ, हम ज़ोओरि (ज़ोरि) या गेता का नाम जापानी चप्पल पहनते हैं।

गेता
                                           
गेता लकड़ी से बना है। और पीछे के थोड़ा सा भाग ज़मीन पर लगाते हैं। बड़गड़ रास्ते या बरफ़ रास्ते पर चलने में अच्छा है। और गर्मी मौसम में भी नंगे पाँव पर गेता पहनना सुखद लगता है। लेकिन गेता से चलने से खटखट आहट सुनाई देता है, इसलिए औपचारिक जगह में गेता पहनते जा नहीं सकते।

भारत में मंदिर के अंदर आने में जूते, चप्पल उतारते हैं। शायद औपचारिक रूप से मोजे भी उतारकर नंगे पैर से आना अच्छा होगा। लेकिन हम लोग अपने पाँव से पवित्र जगह गंदा करने को डरते हैं। ....धोए पैर तो सब से साफ़ होगा, पर जापान का मौसम ऐसे गरम नहीं है जैसे दिन में काई बार पानी से अपने को धोते हैं। तो अपने गंदे तलवे से औपचारिक जगह न गंदा करने के लिए, मोजे पहनते हैं। ज़ोओरि के किए, ताबि का नाम जापानी मोजा है जिसकी नोक के पास दो भाग हैं।




ज़ोओरि 
 
लेकिन औपचारिक ही नहीं, सहज ज़ोओरि भी है।


यह चावल पयाल से बनी ज़ोओरि है। मेरे पति ने तोओकामाचि में यह एक खारीदी ...स्लिपर की बजाए पहनने के लिए।

और मैंने कपड़े रस्सी ज़ोओरि लेकर अब घर में पहनती हूँ।


वे कपड़े ज़ोओरियाँ, सब मेरी मौसी ने बनाईं।

01 May 2010

सुनहरा सप्ताह

जापान के अधिकतर कॉपनी में नियमित कर्मचारियों को एक साल में 120 दिनों के आसपास की छुट्टियाँ मिलते हैं।  हर हफ्ते में शनिवार और रविवार दोनों छुट्टियाँ हैं, ऐसा क़ॉपनी ज़्यादा है। लेकिन लगातार छुट्टियाँ लेना आसान बात नहीं है। अपने बच्चे की शादी के लिए भी 3 दिनों से ज़्यादा छुट्टियाँ लेना तो मुश्किल है।

फ़िर भी सारे जापान में एक साल में 3 बार लगातार छुट्टियाँ लेने का अवसर है।  वर्षान्त-वर्षांरभ, ग्री ष्म, और अब, अप्रैल के अंत से माई के शुरू तक ।



29 अप्रैल तो पूर्व सम्राट की जयंती है। 1 माई  शनिवार, 2 माई रविवार, और 3 संविधान दिवस, 5 बच्चों का दिवस, और 4 माई तो काई साल पहले से छुट्टी हो गया...लगातार छुट्टियाँ बनाने के लिए।  अगर 30 अप्रैल या 6, 7 माई भी छुट्टी ले सकें तो बहुत लंबा छुट्टियाँ होजाएगा । हम इन दिनों को GOLDEN WEEK कहते हैं।

GOLDEN WEEKसारे जापान में चलता है। इसलिए मनोरंजक जगह इधर उधर बहुत बीड़ हो जाती है। कहीं जाना चाहने पर भी टिकट लेना भी मुश्किल है, बैंक भी बंद है, GOLDEN WEEK के पहले और बाद में सदा से और व्यस्त हो जाता है......फ़िर भी हम बहुत मज़ा लेते हैं। इन दिनों,  GOLDEN WEEK के आसपास के मौसम साल में सब से सुखद है।
 
हम भी आज सिनेमा देखने गए, कल मैं 10 सालों बाद अपनी सहेली से मिलूँगी, और परसों पति के साथ मेरे मैके जाऊँ गी।

28 April 2010

मुहर

ज़्यादा देशों में अपन ए को प्रमाणित करने के लिए, हस्ताक्षर करते होंगे। जैसा बैंक से पैसे निकालने में या संविदा करने के समय।   जापान में भी ऐसा समय में ज़रूर अपने हाथ से अपना नाम लिखना चाहिए। और हस्ताक्षर के साथ, अपनी नाम की मुहर भी लगाना है। मकान या ज़मीन का क्र्य-विक्रय  व्यापार, ऐसे महत्वपूर्ण और ज़्यादा पैसे चलाने के अवसर में, ख़ासकर मुहर लगाते हैं और उस मुहर को क आफ़ी ध्यान से रखते हैं ताकि किसी से न इस्तेमाल करें। हम उस ख़ासकर मुहर को सरकारी दफ़्तर को पंजीकृत करते हैं। पंजिकृत मुहर दुनिया में एक ही है।

लेकिन आम की मुहर रोज़ आसनी से इस्तेमाल करते हैं।  सामन लेना, कोई सभा में उपस्थित लेने में, ऐसे समय में हस्ताक्षर भी लिखी बिना, सिर्फ़ बनी-बनाई मुहर ही लगाते हैं। बनी-बनाई मुहर तो बाज़ार में कोई  भी आसनी से मिल सकते हैं। इसलिए ऐसी मुहर लगाने पर किसी की प्रमाणित कर नहीं सकते...यह  काफ़ी जानकर फ़िर हम मुहर इस्तेमाल करते हैं।

प्रमाणित करने में बेकाम होने पर भी, जापानियों को मुहर पसंद है। तरह तरह डिज़ाइन की मुहर बनवाते हैं,  ऐसा लोग भी कम नहीं है। मुझे भी मुहर बहुत पसंद है...मुहर के प्रति खासकर लगावत है। अपने नाम की ही नहीं, एक डिज़ाइन को लगातार बनाने औजार की रूप में।
डिज़ाइन मुहर 




नाम की बनी-बनाई मुहर 

25 April 2010

स्लिपर

जापानी घर के अंदर आने से पहले जूता या चप्पल उतारना चाहिए। हस्पताल, रेस्टराँ, होटल,  विश्वविद्धालय...ऐसी जगह में उतारने की ज़रूरत नहीं है। फिर भी, छोटे निजी हस्पताल या क्लिनिक,  जापानी परंपरित होटल या रेस्टराँ, और स्कूल में हम जूता उतारते हैं।

भारत में भी, व्यकति के घर में ज़्यादातर  उतारते  हैं न ? लेकिन कभी कभी पहनते हुए हैं। भारत में मैंने दूसरे भारतीय लोगों का तौर-तरीके देखकर जूते उतारकर या पहनते हुए घर के भीतर जाती थी। उतारेंगे तो अधिकतर मकान के बाहर उतारते हैं, आप लोग। लेकिन जापान में ज़रूर मकान के अंदर में जूता उतारते हैं।

यह हमारे घर के प्रवेशद्वार है। हमारा फ़्लैट छोटा है, इसलिए प्रवेशद्वार भी छोटा है...मकान के प्रवेशद्वार तो  कम से कम इस का चोगुना, छगुना का चौड़ा है... खैर, जापानी फ़्लैट का प्रवेश्द्वार अधिकतर ऐसा है...।

हम यहाँ जूते उतारते हैं। और उतारने के बाद फ़िर पहनते हैं, चट्टी ( स्लिपर ) को।  स्कूल में भीतरी जूते को।

स्लिपर

और जापानी परंपरित कमरे में फ़िर स्लिपर  उतारते हैं। शौचालय के बाहर भी स्लिप र उतारकर...फिर  शौचालय में दूसरे को , शौचालय के लिए स्लिपर, पहनते हैं !
मकान के भीतर न गंदा करने के लिए प्रवेशद्वार में जूते उतारते हैं। लेकिन क्यों मकाम में ऐसा बार बार  स्लिपर पहनते उतारते हैं?

पता नहीं, पर मेरा विचार यह है...शायद हम जापानि यों के लिए, परंपरित जापानी कमरा, सब से महत्वपूर्ण  है...बढ़ा-चढ़ाकर बोलूँ  तो पवित्र कमरा है। जापानी परंपरित कमरे में तातामि का नाम फ़र्शवाला बिछा  है
जो एक प्रकार पौधे से बनी।  उस तातामि पर जूते या स्लिपर पहनते हुए चलना कभी नहीं जाने देगा।

स्लिपर तातामि साफ़ रखने  के लिए तातामि के कमरे के बाहर  पहनते हैं, शायद।  और अब का शौचालय तो बहुत साफ़ के बावजूद, शायद हमें ऐसा लगता होगा कि फ़िर भी  घर के दूसरे कमरे से अपवित्र है। इसलिए शौचालय के लिए खासकर  स्लिपर पहनते हैं...।


बायाँ : जापानी परंपरित ढंग का कमरा
उस कमरे का फ़र्श लकड़ी का फ़र्शवाले कमरे से थोड़ा सा ऊँचा है।

10 April 2010

कुल चिह्न

यह हमारा कुल चिह्न है।

यह मेरे मैके का


और यह मेरी मंमी के मैके का है।

हर जापानी घर के पास अपना कुल चिह्न है। एक ज़माने में, जब जापनी सजना-धजना कपड़ा किमोनो (जापानी परंपरित कपड़ा) था, औपचारिक कपड़े को अपने कुल चिह्न लगाते थे। अब हम किमोनो बहुत कम पहनते हैं, इसलिए अपना कुल चिह्न भी अधिकतर भूलते हैं। जापान में शादी की कपड़ा भी उधार लेना आम की बात है, फ़िर भी हम उस कपड़े में भी अपने कुल चिह्न लगा सकते हैं। (बाद में आसनी से उसे हटा सकते हैं) काई कुल चिह्न लगाए हुए टाई भी मिल सकता है। और अधिकतर समाधि में भी कुल चिहन लगा है।

जापान के सम्राट का कुल चिह्न यही है।
सारे लेकिन जापान में सब से प्रसिद्ध कुल चिहन तो शायद यह है।
तोक्कुगावा राजघ्राने का है, जापान में जिसका राज 1603 से 1867 तक जारी रखा था। अब भी इस ज़माने का ड्रामा टीवी कार्यक्रम में बराबर दिखाई देता है, इसलिए सब जापानी वह काफ़ी पहचानी हैं।

07 April 2010

अख़बार/ समाचार पत्र

यह जापानी अख़बार है। यह भी ऊपर से नीचे, दायीं से बायीं ओर से पढ़ते हैं।


सब से पीछे अंतिम पत्र में टीवी कार्यक्रम लिखा है। 

हमारे घर में एक दैनिक अख़बार मंगवाते हैं। दिन में दोबारा, सवेरे और शाम को पहुँचता है। रविवार और छुट्टी दिन शाम का अख़्बार नहीं है, सिफ़ सवेरे ही आता है।

दुकान या स्टेशन पर भी अख़बार खरीद सकते हैं, लेकिन माहवारी पढ़े तो, बारिश भी हो, हर स्थिति में भी, ज़रूर मिलता है। और चंदा के अवला रोज़ पहुँचवाने के लिए खासकर पैसा नहीं लगाता है। आजकल समाचार पत्र से नहीं, वेव साइट में समाचार पढ़नेवाला बढ़ रहा है। लेकिन मुझे अख़बार पसंद है। अगर घर में समाचार पत्र नहीं हो तो सब्जी ताज़ा रखने के लिए किस से लपेटूँ ? और खिड़की साफ़ करने के लिए भी समाचार पत्र सब से उपयोगी है।
खासकर अख़बार मंगवाते तो, रोज़ चर्चा पत्र भी साथ साथ आते हैं। आसपास के दुकान का विज्ञापन के।



चर्चा पत्र
आज का डिस्कौण्ट क्या है? आज किस दुकान में क्या क्या सस्ता मिलेगा? यह ढूँढना तो मेरा सुबाह का मनोरंजन है।

04 April 2010

आधा वापस देने की प्रथा

जो पिछ्ले पोस्ट में लिखा, किसी को बधाई करने या दिलासा देने के लिए पैसा देने का हमारा आदत है।

बधाई करने के लिए, कुछ तोहफ़ा भी देते हैं। फ़िर पैसा कुछ काम में भी आता है, उपयोगी होगी...ऐसा सोचकर पैसा देना भी आम की बात है।

ऐसा तर्कपूर्ण जापानी लोगों के पास, बहुत असंगत प्रथा है कि मिला पैसा का आधा, देनेवाले को वापस देने की।

उदाहरण के तौत पर, आप किसी के अंत्योष्टि संस्कार में 5000 येन देंगे तो, 35 या 49 दिन के बाद, उस स्वर्गीय के परिवार से लगभग 2500 येन की कीमत की चीज़ पहुँचेगी। जैसे साबुन, टावेल सेट, ऐसे आवश्यक वस्तुएँ। आज कल कुछ भी आप चाहें, वह चुनने के लिए सूचीपत्र आता है। उन में से आपकी पसंद चीज़ चुनकर वही मिल सकते हैं।

बीमारों की मिज़ाजपुर्सी, वह भी ठीक होने के बाद, मिला पैसे के करीब आधा कीमत की चीज़ भेजते हैं।

जापानी औपचारिक शादी जाते समय, हम पैसा लेते आते हैं। शादी में सिर्फ़ भोजन ही नहीं, कुछ तोह्फ़ा भी मिलेगा। उन की कीमत हमरा दिया पैसे का आधा की कीमत से बराबर नहीं हो सकता है। लेकिन पैसे के अलावा, कुछ भेंट भेजेंगे तो, बाद में अधिकतर आधा पहुँचेगा। बूढ़े लोग ऐसा कहते हैं कि दुख दूर होने के लिए, और खुश बाँटने की प्रथा है। लेकिन मुझे लगता है, बाद में आधा लेने से पहले से आधा देना तो तर्कपूर्ण है।

02 February 2010

survival Japanese 2

खतरनाक जापानी शब्द तो कंजि ही नहीं। जापानी भाषा 3 लिपियों में लिखा है। हिरागाना, काताकाना, और कांजि। कांजि चीन से आई चित्राक्षर है। एक कंजि में कम से कम एक अर्थ है। इसलिए कई कांजि याद करने से खतरनाक शब्द जाना तो अपेक्षाकृत आसान होगा, अगर जापानी भाषा न जीने पर भी। लेकिन हिरागाना,  काताकाना दोनों फ़ोनोग्रम हैं।सब से पहले, जानने की ज़रूरत है कि उन अक्षर कैसे पढ़्ना, और इस के बाद, उस शब्द की अर्थ क्या है । काताकाना पर ध्यान रखना पड़ेगा। विदेशी भाषा को काताकाना में लिखना हमारा आदत है। फिर काताकाना में लिखने से विदेशी शब्द जापानी शब्द बदर जाता है। सुना है कि काताकाना विदेशियों के लिए सब से मुश्किल जापानी है।

मेरी सहेली जो कई खतरनाक जापानी याद कर्ती हैं, उन्होंने मुझे पूछा कि "ビーフ(बीफु) क्या है ?"

ビーフ बीफ है! जापानी में "" का उच्छारण लिखने का अक्षर नहीं है, इसलिए उ लगाकर बीफ़ु लिखते हैं।

 チキン(चिकिन) मुर्गी का मांस
 ポーク(पोकु) सूअर का मांस
 エッグ(एग्गु)  अंडा
 ビーフ(बीफ़ु)  गाय का मांस
 フィッシュ(फ़िश्शु) मछ्ली

अंग्रेज़ी के अलावा, दूसरे विदेशी शब्द भी काताकाना में लिखते हैं।

 エキス (extract : डैच भाषा) रस
 コンソメ (comsomme : फ़ंसीसी भाषा) मांस का शेरबा

24 November 2009

survival Japanese 1

जो भारतीय जापान में रहते हैं, वे लोगों के लिए हमेशा खाने की समस्या होती है। सिर्फ शाकाहारी ही नहीं, अधिकतर भारतीय लोग गोमांस या सूअर का गोश्त नहीं खाते हैं। लेकिन जापान में जापानी भाषा ही चलती है। अँग्रेज़ी में कुछ नहीं लिखा है। इसलिए मेरी भारतीय सहेली कई खतरनाक जापानी शब्द याद करके वे छोड़कर खाना लेती है।


उदाहरण के लिए जैसे कांजि:

       मांस
       मछ्ली
  牛     गाय
       सूअर
     मुर्गी
  玉子  अंडा


लेकिन ये दोनों शब्द का मतलब मांस नहीं है।

  果肉    गूदा
  梅肉    उमेबोशि का पेस्ट

क्या आप को उमेबोशि पता है ? उमेबोशि तो खट्टा परम का अचार है जैसा इमली।